घूमली: बरडा की पहाड़ियों में दबी एक साम्राज्य की अनसुनी दास्तां
घूमली: बरडा की पहाड़ियों में दबी एक साम्राज्य की अनसुनी दास्तां
गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में जब
हम जामनगर से पोरबंदर की ओर बढ़ते हैं, तो
बरडा की पहाड़ियां एक रहस्यमयी खामोशी ओढ़े खड़ी नजर आती हैं। इन्हीं पहाड़ियों की गोद में बसा है 'घूमली'—जिसे
कभी 'भूताम्बिलिका', 'भूमलिका' या 'भंभली' के नाम
से जाना जाता था । आज
भले ही यह जगह शांत खंडहरों का एक समूह नजर आती हो, लेकिन इसके पत्थरों के नीचे सदियों पुराने वैभव, वीरता और एक बेमिसाल सभ्यता की धड़कनें दबी हुई
हैं। यह
केवल कुछ मंदिरों की जगह नहीं है, बल्कि
यह उस दौर का गवाह है जब यह समूचे पश्चिम भारत की एक अजेय राजधानी और सांस्कृतिक
केंद्र हुआ करता था ।
प्रकृति की गोद में एक सामरिक दुर्ग
घूमली का स्थान केवल सुंदर ही नहीं,
बल्कि सामरिक (strategic) दृष्टि से भी अचूक था । जामनगर
से 102 किमी और पोरबंदर से मात्र 43 किमी की दूरी पर स्थित यह प्राचीन नगर वेण (2050
फीट) और आभपरो (1996 फीट) जैसे ऊंचे शिखरों के बीच सुरक्षित था । बरडा की ये पहाड़ियां न केवल सुरक्षा देती थीं, बल्कि जीवन के लिए जरूरी संसाधनों से भी भरपूर थीं । यहाँ की भूमि चूने के पत्थरों और काले खनिजों का
मिश्रण है, जहाँ सीसम, करंज, जेठीमध और रक्तचंदन जैसी औषधीय
वनस्पतियां बहुतायत में उगती हैं ।
यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी 'जल संस्कृति' थी । प्राचीन इंजीनियरों ने पहाड़ों से आने
वाले पानी को सहेजने के लिए 'सप्त
झर' (सात झरने) और 'सप्त सरोवरों' की एक
अद्भुत श्रृंखला बनाई थी । भृगुझर
और जानुझर जैसे झरनों का पानी सोनसर और राणसर जैसे तालाबों में इकट्ठा होता था,
जो यह बताता है कि उस दौर के लोग जल-प्रबंधन की
कला में कितने निपुण थे । यहाँ
तक कि लोककथाओं में उल्लेख मिलता है कि पहाड़ों के पेटाल में जल का विशाल भंडार
छिपा है, जो इस शुष्क क्षेत्र को हमेशा
हरा-भरा रखता था ।
पौराणिक जड़ें और प्राचीन इतिहास
घूमली की जड़ें इतिहास के पन्नों से
कहीं ज्यादा गहरी, पौराणिक गाथाओं तक जाती हैं । कहा जाता है कि वैवस्वत मनु के पुत्र शर्याति ने
यहाँ अपनी सत्ता स्थापित की थी और उनके पुत्र 'आनर्त' के नाम पर ही इस पूरे क्षेत्र का नाम
'आनर्त' पड़ा । यहाँ की प्राचीन राजधानी 'कुशस्थली' थी, जो समय के साथ उजाड़ हो गई, और बाद में भगवान कृष्ण ने इसी पवित्र भूमि पर
अपनी नई द्वारका बसाई थी । कुछ
विद्वान तो यहाँ तक मानते हैं कि पौराणिक 'प्रागज्योतिषपुर'
(नरकासुर का राज्य) असम में नहीं, बल्कि इसी घूमली के आसपास था । इन कथाओं के साथ-साथ यहाँ मिले पत्थरों के औजार
और 'पेंटेड ग्रे वेयर' (Painted
Grey Ware) के अवशेष साबित करते हैं कि
प्रागैतिहासिक काल से ही यहाँ मानव बस्तियां मौजूद थीं ।
सैंधव राजवंश: अरब सागर के असली
स्वामी
इतिहास के प्रमाणित कालखंड में घूमली
का असली सुनहरा दौर आठवीं शताब्दी में 'सैंधव'
(Saindhav) राजवंश के साथ शुरू हुआ । पुष्यदेव द्वारा स्थापित यह राजवंश लगभग 180
वर्षों तक घूमली की गद्दी पर बैठा रहा । इन राजाओं ने खुद को 'अपर समुद्राधिपति' (पश्चिमी
समुद्र के स्वामी) की उपाधि दी थी । यह वह
दौर था जब अरब आक्रमणकारी समुद्री रास्तों से भारत को डराने की कोशिश कर रहे थे,
लेकिन सैंधव राजाओं ने अपनी शक्तिशाली नौसेना के
दम पर उन्हें समुद्र के बीच ही खत्म कर दिया । जयद्रथवंशी ये राजा न केवल महान योद्धा थे,
बल्कि कला के संरक्षक भी थे। नवलखा मंदिर के पास मिले 12 ताम्रपत्र आज भी उनकी गौरवगाथा और उनके द्वारा
दिए गए भूमिदान का लिखित प्रमाण हैं ।
जेठवा राजवंश और नवलखा का निर्माण
सैंधव राजाओं के बाद इस क्षेत्र की
कमान 'जेठवा' (Jethwa) राजवंश के हाथों में आई । हालांकि जेठवाओं को लेकर कई लोककथाएं प्रसिद्ध हैं, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि उनका मूल
संभवतः सैंधव राजवंश से ही जुड़ा था । जेठवाओं
के दौर में घूमली ने स्थापत्य की वो ऊंचाइयां छुईं जो आज भी पर्यटकों और
शोधकर्ताओं को हैरान कर देती हैं । उनके
काल में ही 'नवलखा मंदिर' (Navlakha
Temple) का निर्माण हुआ, जो गुजरात की नागर शैली के चालुक्यकालीन स्थापत्य
का सबसे परिपक्व उदाहरण है ।
नवलखा मंदिर लगभग 153 फीट लंबे और 102 फीट चौड़े एक विशाल चबूतरे यानी महापीठ पर खड़ा है । इसकी सबसे अनूठी विशेषता इसका 'गजथार' (Gajapitha) है—जहाँ दो हाथियों की सूंड आपस में गुंथी हुई दिखाई देती है, जो भव्यता और अटूट शक्ति का प्रतीक है । मंदिर का मण्डप दो मंजिला है और इसमें 22 मुख्य स्तंभ हैं, जिनकी नक्काशी में हाथियों, हंसों,
बंदरों और मछलियों के 17 अलग-अलग प्रकार के शिल्प देखने को मिलते हैं ।
स्थापत्य में जीवन का दर्शन
नवलखा मंदिर केवल पत्थरों की एक
इमारत नहीं, बल्कि एक पूरा जीवन दर्शन है । विद्वानों का मानना है कि इसके आधार से लेकर शिखर
तक की बनावट मानव जीवन की आध्यात्मिक यात्रा को दर्शाती है:
- पीठ और पाया (Base): यहाँ की नक्काशी शुद्धता और अनुशासन का संदेश देती है, जो 'ब्रह्मचर्य आश्रम' का प्रतीक है ।
- जंघा और मध्य भाग (Middle): यहाँ उकेरी गई नर्तकियां, यक्ष-किन्नर और सांसारिक जीवन के दृश्य 'गृहस्थ आश्रम' के कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व को दर्शाते हैं ।
- शिखर (Spires): ऊपर की ओर बढ़ती हुई आकृतियां 'वानप्रस्थ' और अंत में परमात्मा के मिलन यानी 'संन्यास' की ओर संकेत करती हैं ।

विविध आस्थाओं का संगम
घूमली केवल एक धर्म का केंद्र नहीं
थी। यहाँ
बौद्ध विहारों के अवशेष बताते हैं कि मौर्य काल से ही यहाँ बौद्ध साधक अपनी साधना
करते थे । क्षत्रप कालीन गुफाएं और गुप्त काल
के विष्णु मंदिरों के संकेत बताते हैं कि यहाँ सदियों से अलग-अलग संप्रदाय शांति
से साथ रहते आए हैं । यहाँ के ग्यारह रुद्र स्थानों में
नीलकंठ महादेव, महाकालेश्वर और सिद्धनाथ महादेव जैसे
मंदिर आज भी अपनी पवित्रता बनाए हुए हैं ।
पतन और पुनर्जागरण की उम्मीद
इतिहास की हर बड़ी कहानी का एक अंत
होता है। 13वीं शताब्दी के अंत में आंतरिक कलह
और जाडेजा राजाओं के आक्रमणों के कारण घूमली का विनाश हो गया और जेठवाओं को अपनी
राजधानी बदलनी पड़ी । आज
घूमली के खंडहर भले ही खामोश हों, लेकिन
वे हमें बहुत कुछ सिखाते हैं।
मेरी शोध के अनुसार, घूमली का भविष्य केवल पुराने अवशेषों को बचाने तक
सीमित नहीं होना चाहिए । इसे एक
'हेरिटेज स्पिरिचुअल सेंटर' के रूप में विकसित किया जा सकता है, जहाँ इतिहास और आध्यात्म का मिलन हो । 3D लेजर स्कैनिंग और डिजिटल आर्काइविंग जैसी आधुनिक तकनीकों के जरिए इस
अनमोल विरासत को भविष्य के लिए सुरक्षित करना अनिवार्य है । भारत के संविधान के अनुच्छेद 51A (f) के अनुसार, यह हर भारतीय नागरिक का कर्तव्य है
कि वह अपनी इस साझी संस्कृति की रक्षा करे ।
घूमली मात्र पत्थरों का ढेर नहीं है;
यह सौराष्ट्र के उस गौरवशाली अतीत का आईना है
जिसने समुद्रों को जीता और कला को शिखर तक पहुँचाया। आज ज़रूरत है कि हम इन खंडहरों
की आवाज़ सुनें और अपनी जड़ों को फिर से पहचानें।



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