सूरत टेक्सटाइल का पतन: मिडिल ईस्ट की जंग सिर्फ 'आख़िरी कील' है, ताबूत तो सिस्टम ने पहले ही तैयार कर दिया था!

 

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सूरत टेक्सटाइल का पतन: मिडिल ईस्ट की जंग सिर्फ 'आख़िरी कील' है, ताबूत तो सिस्टम ने पहले ही तैयार कर दिया था!

विशेष इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट: प्रतीक काशीकर, संपादक 'टच गुजरात'

सુરત: हमने ४ दिन पहले ही चेतावनी दी थी कि सूरत टेक्सटाइल का किला ढह रहा है, और २ दिन पहले आई खबर ने इस पर मुहर लगा दी। कोयले के ३०% बढ़ते दाम और गैस की कालाबाजारी से प्रॉडक्शन कॉस्ट तो बढ़ ही रही थी, ऊपर से मज़दूरों के पलायन ने मिलों के पहिये जाम कर दिए हैं। नतीजा? South Gujarat Textile Processors Association (SGTPA) ने अब हफ़्ते में सिर्फ ५ दिन काम करने का कड़ा फैसला लिया है।

पर क्या सिर्फ Energy Crisis ही इस बर्बादी की असली वजह है? एक इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के नाते मेरा जवाब है—नहीं! आइए देखते हैं वो 'अदृश्य अस्त्र' जिन्होंने सूरत की रीढ़ पहले ही तोड़ दी थी:

१. कच्चे बिलिंग का 'कैंसर' और पुलिस का 'कट'

सालों से सूरत का व्यापार 'कच्चे बिलिंग' के भरोसे फलता-फूलता रहा, लेकिन यही इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन गया। हज़ारों करोड़ों का चूना लगाने वाले 'धोखेबाज़' खुलेआम घूमते हैं, क्योंकि तंत्र के साथ उनकी साठगांठ है। जब रिकवरी की नौबत आती है, तो पुलिस का 'मोटा कट' व्यापारी की बची-कुची हिम्मत भी तोड़ देता है। हालांकि GST के बाद से हेराफेरी कम हुई है, लेकिन इसने उन छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ दी जिनका धंधा विशुद्ध रूप से 'उधारी' पर चलता था। आज छोटा व्यापारी न उधारी वसूल पा रहा है, न मार्केट में टिक पा रहा है।

२. 'विकल्पों' की घेराबंदी: जब ग्राहक ही मुड़ गया

सूरत का सबसे बड़ा डर अब हकीकत बन चुका है। जो खरीदार देश के कोने-कोने से सूरत आता था, अब वो Divert हो गया है:

  • इंदौर और अमरावती का उदय: मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के नए टेक्सटाइल हब्स आज सूरत के 'मार्केट शेयर' को निगल रहे हैं। वहां बिजली सस्ती है, नीतियां साफ़ हैं और व्यापारियों को 'रेड कार्पेट' मिल रहा है।

  • UP का उभरता बाज़ार: उत्तर प्रदेश में बन रहे नए टेक्सटाइल पार्क्स ने उत्तर भारत के खरीदारों को सूरत आने से रोक दिया है। अब ग्राहक को वही कपड़ा अपने घर के पास मिल रहा है, तो वो सूरत के 'सिंडिकेट' और 'उधारी के दलदल' में क्यों फंसेगा?

३. ₹1.5 लाख करोड़ का साम्राज्य और 'युद्ध' का प्रहार

आज भी सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री ₹1.5 लाख करोड़ का सालाना टर्नओवर रखने वाली देश की सबसे बड़ी ताक़त है। लेकिन यह ताक़त अब खोखली हो चुकी है। मिडिल ईस्ट के युद्ध ने जो Energy Crisis खड़ी की है, वो इस दम तोड़ते उद्योग के 'ताबूत में आख़िरी कील' का काम कर रही है। जब लागत (Energy & Raw Material) बेकाबू होती है, तो सूरत का कपड़ा वैश्विक और घरेलू बाज़ार में अपनी 'प्रतिस्पर्धा' (Competitiveness) खो देता है।


संपादक का निष्कर्ष:

सूरत का टेक्सटाइल उद्योग आज उस मोड़ पर है जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं दिखती, अगर समय रहते 'सिस्टम' की सफ़ाई नहीं हुई। युद्ध तो बाहरी दुश्मन है, सूरत को तो उसके अपनों की 'साठगांठ' और 'कालाबाजारी' ने मारा है।


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