गुजरात BJP की ‘पॉलिटिकल लैब’: मोदी-शाह का विज़न, युवाओं का प्रहार और सत्ता के चक्रव्यूह का पूरा सच

 

गुजरात BJP की ‘पॉलिटिकल लैब’: मोदी-शाह का विज़न, युवाओं का प्रहार और सत्ता के चक्रव्यूह का पूरा सच

सूरत : गुजरात की धरती सिर्फ व्यापार और ढोकले के लिए मशहूर नहीं है, बल्कि ये भारतीय राजनीति का वो पावर हाउस है जहाँ से पूरे देश की किस्मत लिखी जाती है। पिछले तीन दशकों से यहाँ जो राजनीतिक प्रयोग हो रहे हैं, उन्हें दुनिया 'गुजरात मॉडल' और 'बीजेपी की पॉलिटिकल लैब' के नाम से जानती है। लेकिन इस लैब के पीछे की जो असली कहानी है, वो सिर्फ जीत और हार के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इस साम्राज्य की नींव में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की वो 'मास्टर क्लास' छिपी है, जिसने राजनीति को एक आर्ट फॉर्म में बदल दिया है। यहाँ हर चुनाव एक युद्ध की तरह लड़ा जाता है और हर कार्यकर्ता उस सेना का सिपाही है, जिसे पता है कि उसका लक्ष्य क्या है। मोदी-शाह की जोड़ी ने गुजरात को सिर्फ एक गढ़ नहीं बनाया, बल्कि उसे एक ऐसी यूनिवर्सिटी बना दिया जहाँ युवाओं को सत्ता की बारीकियां और संगठन की ताकत का अहसास कराया जाता है।

जब हम इस लैब के सबसे सफल प्रयोग 'पन्ना प्रमुख' की बात करते हैं, तो ये सुनकर भले ही साधारण लगे, पर असल में ये माइक्रो-मैनेजमेंट की वो इंतहा है जहाँ राजनीति मतदाता के ड्राइंग रूम तक पहुँच जाती है। एक-एक पन्ने की जिम्मेदारी, एक-एक घर से निजी रिश्ता और वोटिंग के दिन वोटर को घर से पोलिंग बूथ तक लाने की वो जिद—यही वो मशीनरी है जिसने गुजरात में बीजेपी को अजेय बना दिया है। लेकिन इस मशीन को चलाने के लिए जिस ईंधन की जरूरत होती है, वो है 'प्रेरणा'। यहाँ नरेंद्र मोदी सिर्फ एक प्रधानमंत्री या पूर्व मुख्यमंत्री नहीं हैं, वो हर गुजराती युवा के लिए वो सपना हैं जिसे सच किया जा सकता है। मोदी साहब ने युवाओं को सिखाया कि कैसे अपनी जड़ों से जुड़कर आसमान को छुआ जाता है, और अमित शाह ने उन्हें वो 'गाइडेंस' दी कि सत्ता को कैसे अनुशासित रहकर संभाला जाता है। इन दोनों के विज़न ने गुजरात में एक ऐसे नेतृत्व को जन्म दिया जो आज की मॉडर्न दुनिया की भाषा भी समझता है और संगठन की मर्यादा भी।

इसी कड़ी में आज का सबसे चर्चित नाम है हर्ष संघवी। सूरत की गलियों से निकलकर गांधीनगर के सत्ता के गलियारों तक का उनका सफर उन हज़ारों युवाओं के लिए मिसाल है जो राजनीति में बदलाव लाना चाहते हैं। हर्ष संघवी को गृह राज्य मंत्री जैसी भारी-भरकम जिम्मेदारी देना मोदी-शाह का वो 'कैलकुलेटेड रिस्क' था, जिसने गुजरात की कानून-व्यवस्था को एक नई पहचान दी। उनकी वर्किंग स्टाइल में वो 'स्वैग' है जो आज के जेन-जी युवाओं को पसंद आता है—बिना किसी तामझाम के सीधे ग्राउंड पर उतरना, रात के अंधेरे में पुलिस थानों का औचक निरीक्षण करना और अपराधियों को सीधे शब्दों में चेतावनी देना कि 'सुधर जाओ वरना हम सुधार देंगे'। हर्ष ने ये साबित किया कि राजनीति सिर्फ भाषणबाजी नहीं है, बल्कि वो 'एक्शन' है जो जनता को सड़क पर दिखाई दे। उनके आने के बाद जिस तरह से ड्रग्स और संगठित अपराध के खिलाफ अभियान चला, उसने ये मैसेज क्लियर कर दिया कि गुजरात का गृह विभाग अब 'डिजिटल और डायनेमिक' हो चुका है।

पर ये कहानी यहाँ खत्म नहीं होती। जब कोई संगठन इतना बड़ा हो जाता है, तो उसमें दरारें पड़ना भी लाजमी है। गुजरात बीजेपी की इस लैब का सबसे बड़ा चैलेंज ये है कि क्या वो 'ब्रांड मोदी' के बिना अपनी पहचान बरकरार रख पाएगी? अक्सर ये सवाल उठता है कि जब चुनाव सिर्फ मोदी जी के चेहरे पर लड़ा जाता है, तो स्थानीय विधायकों और नेताओं की जवाबदेही क्या रह जाती है? कई बार ऐसा लगता है कि बड़े मुद्दों के शोर में मोहल्ले की नालियां, टूटी सड़कें और बेरोजगारी की खामोश चीखें दब जाती हैं। संगठन इतना मजबूत और कॉर्पोरेट जैसा हो गया है कि कार्यकर्ता कई बार खुद को एक सिस्टम का हिस्सा मात्र समझने लगता है, जहाँ भावनाओं से ज्यादा डेटा की कदर होती है। ऊपर से पूरी की पूरी कैबिनेट को एक झटके में बदल देना, पुराने और तजुर्बेकार नेताओं को घर बिठा देना—ये सब ऐसे फैसले हैं जो भले ही चुनावी तौर पर फिट बैठते हों, पर पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र में एक अजीब सी खामोश नाराजगी भी पैदा करते हैं।

इस पूरे सीन में विपक्ष का गायब होना या आपस में लड़ना बीजेपी के लिए एक 'वैक्यूम' पैदा कर देता है, जहाँ जीत का रास्ता आसान दिखने लगता है। लेकिन असली लोकतंत्र वो है जहाँ चुनौतियां कड़ी हों। आज गुजरात का युवा सिर्फ़ मुफ्त की योजनाओं से खुश नहीं है, उसे बेहतर एजुकेशन, हाई-टेक जॉब्स और एक ऐसा सिस्टम चाहिए जो पारदर्शी हो। हर्ष संघवी और भूपेंद्र पटेल की टीम के लिए असली परीक्षा ये है कि वो मोदी-शाह के दिखाए रास्ते पर चलते हुए अपनी एक स्वतंत्र पहचान कैसे बनाते हैं। उन्हें ये साबित करना होगा कि वो सिर्फ एक बड़े विज़न के 'एक्जीक्यूटर' नहीं हैं, बल्कि उनके पास गुजरात के आने वाले 50 सालों का अपना एक मास्टर प्लान भी है।

अंतिम विश्लेषण में, गुजरात की ये पॉलिटिकल लैब तब तक ही सफल रहेगी जब तक इसमें जनता का फीडबैक और उनकी नाराजगी को जगह मिलती रहेगी। मोदी और शाह ने एक ऐसा ढांचा खड़ा कर दिया है जिसे हिलाना फिलहाल मुमकिन नहीं दिखता, लेकिन इतिहास गवाह है कि सत्ता का गुरूर और जनता की अनदेखी बड़े-बड़े साम्राज्यों को मिट्टी में मिला देती है। इसलिए, 'टच गुजरात' का ये विश्लेषण साफ़ कहता है कि युवाओं का जोश और बड़ों का मार्गदर्शन एक पावरफुल कॉम्बो तो है, पर इसकी सफलता की गारंटी सिर्फ और सिर्फ जनता की संतुष्टि है। जब तक हर्ष जैसे नेता ग्राउंड पर पसीना बहाते रहेंगे और मोदी-शाह का विज़न रास्ता दिखाता रहेगा, तब तक ये लैब नए-नए कीर्तिमान स्थापित करती रहेगी, लेकिन जिस दिन ये जड़ों से कटी, उस दिन कहानी बदल भी सकती है।


टच गुजरात विशेष - दीक्षित की कलम से वो सच, जो सत्ता की चमक के पीछे भी दिखता है!


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