साबरमती का 'मेकअप' बनाम खंभात की 'खामोश मौत'—850 करोड़ का रिवरफ्रंट या 5000 करोड़ का सालाना नुकसान?

साबरमती का 'मेकअप' बनाम खंभात की 'खामोश मौत'—850 करोड़ का रिवरफ्रंट या 5000 करोड़ का सालाना नुकसान?

 

प्रतीक काशीकर (एडिटर - टच गुजरात)

गांधीनगर/सूरत: गुजरात सरकार ने अहमदाबाद में साबरमती रिवरफ्रंट फेज-2 के लिए 850 करोड़ का बजट पास किया है। शहर की दीवारों पर चमचमाते गार्डन और सेल्फी पॉइंट्स की तैयारी चल रही है, लेकिन अहमदाबाद से 100 किलोमीटर दूर खंभात की खाड़ी के मुहाने (Estuary) पर कुदरत का 'कत्ल' हो रहा है। विकास की इस अंधी दौड़ ने साबरमती को एक 'ज़िंदा नदी' से बदलकर 'ठहरे हुए गंदे तालाब' में तब्दील कर दिया है, जिसकी कीमत खंभात के हज़ारों किसान और मछुआरे चुका रहे हैं।

1. ₹850 करोड़ का दिखावा और नदी की 'हत्या'

अहमदाबाद में साबरमती को नर्मदा के पानी से लबालब भरकर सुंदर दिखाया जाता है, लेकिन शहर के नीचे (Downstream) नदी पूरी तरह से 'इकोलॉजिकली डेड' है।

  • ठहरा हुआ ज़हर: रिवरफ्रंट के गेट्स बंद होने के कारण मीठा पानी मुहाने तक नहीं पहुँच पाता। नतीजा यह है कि अहमदाबाद के नीचे नदी केवल फैक्ट्रियों का ज़हरीला केमिकल और गंदा सीवेज ढोने वाला एक 'डेड नाला' बनकर रह गई है।

2. खंभात: जहाँ नमक उम्मीदें निगल रहा है

जब नदी का मीठा पानी पूरे वेग से समुद्र को पीछे नहीं धकेलता, तो कुदरती संतुलन बिगड़ जाता है।

  • बंजर हुई ज़मीन: सरकारी आंकड़ों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, खंभात और धोलका तालुका की 1.5 लाख हेक्टेयर से ज़्यादा उपजाऊ ज़मीन अब खेती लायक नहीं रही। यहाँ की मिट्टी पर अब अनाज नहीं, बल्कि 'नमक की सफेद चादर' बिछी हुई है।

  • पीने के पानी का संकट: ग्राउंड वॉटर इतना खारा हो चुका है कि हज़ारों गाँवों में अब पीने के पानी का एक भी कुदरती स्रोत नहीं बचा है।

3. 'कल्पसर' का सपना और हकीकत की धूल

नरेंद्र मोदी के 'ड्रीम प्रोजेक्ट' कल्पसर (दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील) का नाम लेकर जनता को सपना तो दिखाया गया, पर उस सपने के चक्कर में हमने खंभात के मुहाने की असली मौत को नज़रअंदाज़ कर दिया।

  • CAG की रिपोर्ट: पिछले 15 सालों में कल्पसर पर करोड़ों रुपये सिर्फ 'सर्वे' और 'स्टडी' में खर्च हो गए हैं, पर ज़मीनी काम शून्य है। कल्पसर का सपना कब हकीकत बनेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

4. आर्थिक बर्बादी: क्या यह विकास है?

प्रतीक, सरकार को लगता है कि रिवरफ्रंट से टूरिज्म बढ़ेगा, लेकिन खंभात की बर्बादी से जो नुकसान हो रहा है, उसका गणित चौंकाने वाला है:

सेक्टरसालाना अनुमानित नुकसान (Revenue Loss)अन्य प्रभाव
कृषि (Agriculture)₹2,500 करोड़हज़ारों किसानों का पलायन, ज़मीन बंजर।
मत्स्य (Fisheries)₹1,200 करोड़मछुआरों का रोज़गार खत्म, हिल्सा मछली लुप्त।
बंदरगाह (Port Charges)₹800 करोड़ऐतिहासिक खंभात बंदरगाह पूरी तरह बंद।
कुल सालाना घाटा₹4,500 करोड़+गुजरात की GDP में अदृश्य चोट।

निष्कर्ष: 'Touch Gujarat' का सीधा सवाल

क्या एक शहर को 'सजाने' के लिए हम पूरे कोस्टल इकोसिस्टम और हज़ारों लोगों की आजीविका की बलि दे सकते हैं? नर्मदा का पानी राजस्थान जा सकता है, तो क्या वह खंभात के मुहाने को बचाने के लिए नहीं बहाया जा सकता? कल्पसर का सपना कब हकीकत बनेगा या यह सिर्फ एक चुनावी लॉलीपॉप है?


** Bibliography (संदर्भ और सबूत)**

  1. Central Pollution Control Board (CPCB): Polluted River Stretches for Restoration of Water Quality. (Priority 1: Sabarmati River).

  2. Gujarat High Court Order (Suo Motu): Writ Petition No. 98 of 2021 regarding Sabarmati Pollution.

  3. National Institute of Oceanography (NIO): Impact of Industrial Effluents and Salinity Ingress on Sabarmati Estuary.

  4. CAG (Comptroller and Auditor General) Report: Audit of Water Resources Department, Government of Gujarat.

  5. Kalpasar Department, Govt. of Gujarat: Pre-feasibility Reports on Kalpasar Project implementation delays.

  6. Central Marine Fisheries Research Institute (CMFRI): Reports on declining estuarine fisheries in Gujarat.

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