मंडल के 36 साल बाद: क्यों फिर उठ रहा है ‘आरक्षण हटाओ’ का सवाल?
मंडल के 36 साल बाद: क्यों फिर उठ रहा है ‘आरक्षण हटाओ’ का सवाल?
सामाजिक प्रतिनिधित्व, मेरिट, परीक्षा व्यवस्था और बदलती राजनीति के बीच भारत की आरक्षण नीति किस मोड़ पर खड़ी है?
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ नीतियां ऐसी होती हैं जो केवल सरकारी व्यवस्था को नहीं बदलतीं, बल्कि समाज की संरचना, राजनीति की दिशा और नागरिकों के अवसरों को देखने के नजरिए को भी प्रभावित करती हैं। 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का फैसला ऐसा ही एक ऐतिहासिक मोड़ था।
तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए केंद्रीय सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के निर्णय ने भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय को केंद्रीय मुद्दा बना दिया। इसके बाद देश की राजनीति में पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व बढ़ा, नए राजनीतिक नेतृत्व का उदय हुआ और सत्ता-संरचना में उन समुदायों की भागीदारी पर बहस तेज हुई, जिन्हें लंबे समय तक पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला था।
लेकिन 36 साल बाद बहस का स्वरूप बदल रहा है।
आज आरक्षण के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, पेपर लीक, सीमित सरकारी सीटें, आर्थिक असमानता, क्रीमी लेयर और कट-ऑफ में अंतर जैसे सवाल भी युवाओं के बीच चर्चा के केंद्र में हैं। सोशल मीडिया और छात्र आंदोलनों में ‘मेरिट बचाओ’, ‘आर्थिक आधार पर अवसर’ और ‘आरक्षण नीति की समीक्षा’ जैसे नारे सुनाई देते हैं।
ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि आरक्षण होना चाहिए या नहीं।
बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्तमान आरक्षण व्यवस्था अपने मूल सामाजिक न्याय के उद्देश्य को सबसे प्रभावी तरीके से पूरा कर रही है? और क्या सामाजिक न्याय तथा व्यक्तिगत योग्यता को एक-दूसरे का विरोधी बनाए बिना अवसरों की अधिक न्यायपूर्ण व्यवस्था तैयार की जा सकती है?
1. मंडल आयोग: सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति का निर्णायक मोड़
1979 में तत्कालीन मोरारजी देसाई सरकार ने बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया। आयोग का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति का अध्ययन करना और उनके लिए आवश्यक नीतिगत उपाय सुझाना था।
मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में OBC के लिए सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की। रिपोर्ट कई वर्षों तक ठंडे बस्ते में रही। 1990 में वी.पी. सिंह सरकार ने इसके प्रमुख हिस्से को लागू करने की घोषणा की।
यह फैसला केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं था। इसने भारतीय राजनीति में सत्ता और प्रतिनिधित्व के पुराने समीकरणों को चुनौती दी।
वी.पी. सिंह और मंडल का राजनीतिक संदर्भ
वी.पी. सिंह का राजनीतिक सफर भी इस निर्णय की पृष्ठभूमि को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। राजीव गांधी सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए उन्होंने कर चोरी और आर्थिक अनियमितताओं के खिलाफ कार्रवाई के कारण एक सख्त प्रशासक की छवि बनाई। बाद में रक्षा मंत्री रहते हुए बोफोर्स विवाद के बीच उनका कांग्रेस से अलग होना राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम बना।
1989 में जनता दल के नेतृत्व में बनी सरकार के प्रधानमंत्री बनने के बाद वी.पी. सिंह के सामने एक जटिल राजनीतिक परिस्थिति थी। एक ओर भ्रष्टाचार का मुद्दा था, दूसरी ओर ग्रामीण और पिछड़े वर्गों की राजनीतिक लामबंदी बढ़ रही थी। इसी समय अयोध्या आंदोलन भी तेजी से राजनीतिक प्रभाव पैदा कर रहा था।
मंडल आयोग को लागू करने का निर्णय इसलिए सामाजिक न्याय की नीति होने के साथ-साथ तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों से भी जुड़ा हुआ था। यहीं से भारतीय राजनीति में ‘मंडल बनाम कमंडल’ का दौर मजबूत हुआ।
2. मंडल के बाद क्या बदला?
आरक्षण की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों को केवल सरकारी नौकरियों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। इसका एक बड़ा प्रभाव यह रहा कि पिछड़े वर्गों के बीच शिक्षा, सरकारी सेवाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर आकांक्षा बढ़ी।
- प्रतिनिधित्व: सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र में OBC प्रतिनिधित्व धीरे-धीरे बढ़ा। इससे प्रशासनिक व्यवस्था में पहले की तुलना में सामाजिक विविधता आई।
- सामाजिक गतिशीलता: कई परिवारों में पहली पीढ़ी ने उच्च शिक्षा और संगठित क्षेत्र की नौकरियों तक पहुंच बनाई। एक सरकारी नौकरी केवल एक व्यक्ति की आर्थिक स्थिति नहीं बदलती; कई बार वह पूरे परिवार की सामाजिक स्थिति को बदल देती है।
- राजनीतिक सशक्तिकरण: उत्तर भारत में अनेक क्षेत्रीय राजनीतिक दलों और नेताओं का उदय हुआ, जिन्होंने पिछड़े वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। दक्षिण भारत में भी आरक्षण और सामाजिक न्याय की राजनीति पहले से ही मजबूत थी। इस तरह मंडल ने पूरे देश में प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की बहस को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना दिया।
- अधिकार और अवसर की चेतना: आरक्षण का एक महत्वपूर्ण प्रभाव यह भी रहा कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों में शिक्षा, सरकारी संस्थानों और राजनीतिक भागीदारी के प्रति आकांक्षा बढ़ी।
3. लेकिन तीन दशकों बाद कौन-से सवाल खड़े हुए?
किसी भी दीर्घकालिक नीति की तरह आरक्षण व्यवस्था के सामने भी समय के साथ नई चुनौतियां आईं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—क्या आरक्षण का लाभ सभी पिछड़े समुदायों तक समान रूप से पहुंच रहा है?
क्रीमी लेयर और आंतरिक असमानता
OBC समुदाय कोई एक समान सामाजिक समूह नहीं है। इसके भीतर आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक स्थिति में काफी अंतर है।
इसीलिए यह तर्क सामने आता रहा है कि अपेक्षाकृत सक्षम OBC परिवारों को लगातार लाभ मिलने के कारण अत्यंत पिछड़े समुदाय अपेक्षाकृत पीछे रह सकते हैं।
1992 के ऐतिहासिक 'इन्द्रा साहनी' फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 'क्रीमी लेयर' की अवधारणा को इसी समस्या को संबोधित करने के लिए लागू किया था। लेकिन इसके आय मापदंडों और व्यावहारिक क्रियान्वयन को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इसलिए सवाल आरक्षण के अस्तित्व से आगे बढ़कर अब यह भी है: “आरक्षण का लाभ वास्तव में किसे मिल रहा है?”
4. मेरिट बनाम सामाजिक न्याय: क्या यह वास्तव में दो विरोधी विचार हैं?
आरक्षण पर सबसे तीखी बहस ‘मेरिट’ को लेकर होती है।
एक ओर सामान्य या गैर-आरक्षित श्रेणी के अनेक विद्यार्थी यह महसूस करते हैं कि उन्हें समान परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करने के बावजूद सीट नहीं मिलती। दूसरी ओर आरक्षण के समर्थक कहते हैं कि केवल परीक्षा में प्राप्त अंक किसी व्यक्ति की वास्तविक क्षमता या उसके अवसरों की पूरी कहानी नहीं बताते।
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है: समान परीक्षा देना और समान परिस्थितियों में परीक्षा देना एक ही बात नहीं है।
एक विद्यार्थी को अच्छे स्कूल, निजी ट्यूशन, महंगी कोचिंग, डिजिटल संसाधन और शिक्षित पारिवारिक वातावरण मिलता है। दूसरा विद्यार्थी कमजोर विद्यालयी व्यवस्था और सीमित संसाधनों के बीच उसी परीक्षा की तैयारी करता है। इसलिए आरक्षण के समर्थकों का तर्क है कि यदि शुरुआती अवसर समान नहीं हैं, तो अंतिम परीक्षा में केवल अंकों की तुलना को पूरी तरह ‘मेरिट’ का पर्याय नहीं माना जा सकता।
लेकिन दूसरी तरफ आरक्षण की आलोचना करने वालों का प्रश्न भी गंभीर है: यदि किसी पेशे में न्यूनतम दक्षता अत्यंत महत्वपूर्ण है, तो क्या सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिए न्यूनतम योग्यता के मानकों को अत्यधिक नीचे ले जाना उचित होगा?
5. ‘95 बनाम बेहद कम कट-ऑफ’: कट-ऑफ की बहस को कैसे समझें?
सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे उदाहरण सामने आते हैं जहां सामान्य श्रेणी के विद्यार्थी को बहुत अधिक अंक प्राप्त करने के बावजूद सीट नहीं मिलती, जबकि किसी आरक्षित श्रेणी का कट-ऑफ काफी कम दिखाई देता है।
इन उदाहरणों को समझते समय एक सावधानी जरूरी है: हर परीक्षा की qualifying marks, category-wise cut-off, counselling rules और actual admission cut-off अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए ‘शून्य अंक’ या ‘नकारात्मक अंक पर दाखिला’ जैसे दावों को किसी परीक्षा, वर्ष और आधिकारिक नियम के संदर्भ के बिना सार्वभौमिक सत्य मानना उचित नहीं है।
फिर भी इस प्रकार के उदाहरण एक वास्तविक भावना को सामने लाते हैं—अवसरों की असमानता को लेकर सामान्य और गैर-आरक्षित वर्ग के युवाओं में बढ़ती बेचैनी। उनका सवाल है कि यदि कोई विद्यार्थी वर्षों तक तैयारी करता है, 90-95% अंक प्राप्त करता है और फिर भी उसे प्रवेश नहीं मिलता, तो क्या व्यवस्था में उसकी मेहनत को पर्याप्त महत्व मिल रहा है?
6. NEET और पेपर लीक ने बहस को क्यों और तीखा कर दिया?
पिछले कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े पेपर लीक, परीक्षा परिणामों को लेकर विवाद और प्रशासनिक अनियमितताओं ने युवाओं के बीच भरोसे का गहरा संकट पैदा किया है। NEET जैसी परीक्षाओं में लाखों विद्यार्थी सीमित सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा: पेपर लीक और आरक्षण दो अलग-अलग समस्याएं हैं।
पेपर लीक का समाधान बेहतर परीक्षा सुरक्षा, तकनीकी पारदर्शिता और कठोर प्रशासनिक कार्रवाई है। वहीं आरक्षण सामाजिक और प्रतिनिधित्व संबंधी असमानताओं को संबोधित करने वाली नीति है।
लेकिन परीक्षा प्रणाली में अव्यवस्था ने पुरानी बहस को नई ऊर्जा दी है। जब सीटें पहले से सीमित हों, प्रतियोगिता अत्यधिक हो, सीटें बिकने के आरोप लगें और परीक्षा की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठें, तो सामान्य वर्ग के युवाओं में यह असंतोष बढ़ जाता है कि उनके लिए 'ओपन मेरिट' की राह लगभग असंभव होती जा रही है।
7. ‘ओपन मेरिट’ को लेकर एक जरूरी तथ्य
आरक्षण पर बहस में अक्सर यह धारणा दिखाई देती है कि ‘अनारक्षित सीटें केवल सामान्य वर्ग के लिए होती हैं।’
तकनीकी और कानूनी रूप से यह पूरी तस्वीर नहीं है। ओपन या अनारक्षित (Unreserved) सीटें किसी वर्ग विशेष के लिए आरक्षित नहीं होतीं। इन सीटों पर सभी पात्र उम्मीदवार प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, जिसमें आरक्षित श्रेणी के वे मेधावी उम्मीदवार भी शामिल होते हैं जो सामान्य वर्ग के कट-ऑफ को पार करते हैं।
इस अंतर को समझना जरूरी है, क्योंकि ‘अनारक्षित’ और ‘सामान्य वर्ग’ को एक मान लेने से आरक्षण व्यवस्था की वास्तविक संरचना को समझने में भ्रम पैदा होता है।
8. आर्थिक दबाव: क्या केवल जाति पर्याप्त आधार है?
आरक्षण की बहस में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न आर्थिक स्थिति का है। एक ही जाति या श्रेणी के भीतर भी परिवारों की आर्थिक स्थिति में भारी अंतर हो सकता है।
इसी असंतुलन को पाटने के लिए 2019 में 103वें संविधान संशोधन के जरिए सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए 10% EWS आरक्षण लागू किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी ‘जनहित अभियान बनाम भारत संघ’ मामले में इसे संवैधानिक रूप से वैध ठहराया और यह स्वीकार किया कि आर्थिक आधार भी सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) का एक मान्य पैमाना हो सकता है।
लेकिन यहां भी सवाल खत्म नहीं होता: गरीबी और सामाजिक भेदभाव एक ही चीज नहीं हैं।
आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को वित्तीय सहायता और छात्रवृत्ति की आवश्यकता होती है, जबकि ऐतिहासिक सामाजिक बहिष्कार का सामना करने वाले समुदाय को प्रतिनिधित्व और संस्थागत सुरक्षा की जरूरत होती है। इसलिए आर्थिक और सामाजिक दोनों आयामों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
9. राजनीति में ‘मंडल 2.0’ की वापसी?
आरक्षण अब केवल प्रशासनिक नीति नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति का केंद्र बन चुका है। जाति जनगणना की मांग, OBC प्रतिनिधित्व का विस्तार, आरक्षण की 50% सीमा को हटाने की वकालत और ‘जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी भागीदारी’ जैसे नारे इस बहस को ‘मंडल 2.0’ की ओर ले जा रहे हैं।
एक ओर राजनीतिक दल सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए आरक्षण के दायरे को विस्तार देने की होड़ में हैं। दूसरी ओर, उनके सामने सामान्य और आर्थिक रूप से कमजोर गैर-आरक्षित युवाओं की संभावित नाराजगी का दबाव भी है।
यही कारण है कि आज कोई भी राजनीतिक दल इस मुद्दे पर स्पष्ट और एकतरफा रुख अपनाने से बचता है।
10. क्या नई पीढ़ी जाति से आगे सोच रही है?
भारत की युवा आबादी के बीच रोजगार, शिक्षा, परीक्षा की पारदर्शिता और आर्थिक अवसर लगातार सबसे बड़े मुद्दे बने हुए हैं।
लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि नई पीढ़ी पूरी तरह जातिगत राजनीति से ऊपर उठ चुकी है। वास्तविकता अधिक व्यावहारिक है: युवा एक साथ सामाजिक न्याय भी चाहता है और निष्पक्ष प्रतियोगिता भी। एक OBC विद्यार्थी प्रतिनिधित्व की मांग के साथ-साथ पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाता है, और एक सामान्य वर्ग का विद्यार्थी मेरिट की रक्षा के साथ-साथ गरीब छात्रों की मदद का समर्थन करता है।
इसलिए नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को केवल ‘आरक्षण समर्थक’ या ‘आरक्षण विरोधी’ के रूप में बांटना जमीनी हकीकत को अनदेखा करना होगा।
11. आगे की राह: आरक्षण को खत्म करना या सुधारना?
आरक्षण को रातों-रात समाप्त करने की मांग व्यावहारिक नहीं है, लेकिन इसे बिना किसी समीक्षा के जस-का-तस छोड़ देना भी प्रतिभा और विकास के साथ न्याय नहीं है। सुधार के प्रमुख नीतिगत कदम:
- उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) को लागू करना: न्यायमूर्ति जी. रोहिणी आयोग (Justice Rohini Commission) की रिपोर्ट के आधार पर OBC कोटे का उप-वर्गीकरण किया जाना चाहिए, ताकि आरक्षण का लाभ उन सैकड़ों अत्यंत पिछड़ी और वंचित जातियों तक पहुंचे जो अब तक इससे पूरी तरह महरूम रही हैं।
- क्रीमी लेयर की सख्त निगरानी: क्रीमी लेयर के नियमों का पारदर्शी और कड़ा क्रियान्वयन हो, ताकि संपन्न हो चुके परिवार लगातार पीढ़ियों तक इसका लाभ न उठाते रहें।
- न्यूनतम योग्यता मानकों (Minimum Competency) का निर्धारण: चिकित्सा, सुपर-स्पेशलिटी, उच्च तकनीकी और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता का एक कठोर बेंचमार्क तय होना चाहिए। प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है, लेकिन वह न्यूनतम कार्यकुशलता का विकल्प नहीं हो सकता।
- स्कूली शिक्षा में बड़ा निवेश: असली समाधान कॉलेज स्तर पर कोटा बांटने से ज्यादा प्राथमिक और माध्यमिक सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने में है। जब हर गरीब बच्चे को उत्कृष्ट शिक्षा मिलेगी, तभी प्रतियोगिता का स्तर सही मायनों में समान होगा।
- परीक्षा प्रणाली की पूर्ण सुरक्षा: प्रतियोगी परीक्षाओं में आधुनिक तकनीक, सख्त डिजिटल सुरक्षा और त्वरित अदालती कार्रवाई सुनिश्चित की जाए ताकि पेपर लीक जैसी धांधली मेधावी छात्रों के सपनों को न तोड़े।
निष्कर्ष: सवाल आरक्षण बनाम मेरिट का नहीं, न्यायपूर्ण अवसर का है
1990 में मंडल आयोग ने भारतीय लोकतंत्र के सामने एक मूलभूत प्रश्न रखा था—क्या लोकतंत्र केवल वोट का अधिकार है या सत्ता और अवसरों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व भी उसका हिस्सा है?
2026 का भारत एक नया प्रश्न पूछ रहा है: सामाजिक न्याय को बनाए रखते हुए ऐसी व्यवस्था कैसे बनाई जाए जिसमें अवसर निष्पक्ष हों, परीक्षा प्रणाली विश्वसनीय हो और योग्यता के न्यूनतम मानकों से समझौता न हो?
भारत के सामने विकल्प केवल दो नहीं हैं—'आरक्षण रखो' या 'आरक्षण हटाओ'। तीसरा और सबसे मजबूत रास्ता सुधार का है: आरक्षण को अधिक लक्षित (targeted) बनाना, शिक्षा की बुनियादी खाई को पाटना और हर छात्र के लिए निष्पक्ष मैदान तैयार करना।
यही संतुलन भारत के अगले सामाजिक और राजनीतिक अध्याय की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होगा।

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