गुजरात: लोकतंत्र या सिर्फ एक 'औपचारिकता'?

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गुजरात: लोकतंत्र या सिर्फ एक 'औपचारिकता'?


गुजरात चुनाव 2026: आक्रोश की लहर या वर्चस्व का विस्तार? अल्थान कांड, 'टिकटों की मंडी' और भाजपा के अजेय दुर्ग का कड़वा सच


विशेष विश्लेषण: प्रतीक (संपादक, Touch Gujarat)


सूरत | 25 अप्रैल 2026

कल 26 अप्रैल को गुजरात की जनता स्थानीय स्वराज्य की संस्थाओं के लिए मतदान करेगी। ऊपर से देखने पर यह एक सामान्य चुनाव लग सकता है, लेकिन सूरत की गलियों से लेकर गांधीनगर के सत्ता गलियारों तक जो सुगबुगाहट है, वह किसी बड़े राजनीतिक भूकंप से कम नहीं है। एक तरफ जनता का वह आक्रोश है जो उम्मीदवारों को गलियों से खदेड़ रहा है, और दूसरी तरफ भाजपा का वह अभेद्य किला है जो चुनाव से पहले ही 700 से अधिक सीटें जीत चुका है। इस विरोधाभास के पीछे की कहानी को समझने के लिए हमें आज की इन चार कड़वी हकीकतों का पोस्टमार्टम करना होगा।

1. 700+ निर्विरोध सीटें: लोकतंत्र का 'मौन' या विपक्ष का 'मृत्युलेख'?

गुजरात के चुनावी इतिहास में यह आंकड़ा चौंकाने वाला है। मतदान से पहले ही भाजपा का 700 से अधिक सीटें जीत लेना यह बताता है कि मुकाबला शुरू होने से पहले ही खत्म हो चुका है। जब मुख्य विपक्षी दल—कांग्रेस और आम आदमी पार्टी—कई सीटों पर उम्मीदवार तक खड़े नहीं कर पाए, तो इसे भाजपा की लोकप्रियता कहें या विपक्ष का आत्मसमर्पण? यह स्थिति लोकतंत्र के लिए एक 'शॉर्ट-सर्किट' जैसी है, जहाँ जनता के पास चुनने के लिए 'दूसरा नाम' ही मौजूद नहीं है।

2. कांग्रेस का पतन: विचारधारा की जगह 'मंडी' का उदय

एक दौर था जब गुजरात में कांग्रेस का संगठन ब्लॉक स्तर तक मज़बूत था। लेकिन 2026 तक आते-आते कांग्रेस एक ऐसी पार्टी बन गई है जिसके पास न नेता है, न नीति। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि इस बार कांग्रेस ने उम्मीदवारों को उनकी योग्यता पर नहीं, बल्कि उनकी 'जेब' के आधार पर टिकट दिए हैं। 15 से 20 लाख रुपये में टिकटों की खरीद-फरोख्त की खबरों ने कांग्रेस के बचे-कुचे कैडर का मनोबल भी तोड़ दिया है। जब विपक्ष खुद एक 'व्यापारिक केंद्र' बन जाए, तो जनता उस पर दांव लगाने का जोखिम क्यों उठाएगी?

3. अल्थान कांड और ध्रुवीकरण की नई आग

24 अप्रैल को सूरत के अल्थान इलाके में हुई घटना ने चुनाव के आखिरी घंटों में आग लगा दी है। एक 12 वर्षीय हिंदू पाटीदार बालिका के साथ 40 वर्षीय मुस्लिम शख्स और उसके साथियों द्वारा की गई छेड़खानी ने सूरत के शांत माहौल को 'हिंदू-मुस्लिम' कार्ड की तरफ मोड़ दिया है।

  • जनता का न्याय: स्थानीय लोगों द्वारा आरोपी की पिटाई और पुलिस द्वारा किए गए सीन रिकंस्ट्रक्शन के दौरान फिर से हुई 'मरम्मत' ने जनता के गुस्से को सड़कों पर ला दिया है।

  • क्रेडिट की जंग: इस बीच एक कथित ऑडियो वायरल हुआ है जिसमें 'आप' (AAP) नेता के करीबी को यह कहते सुना जा सकता है कि इस घटना पर आक्रामक विरोध करो, वरना हर्ष संघवी सारा 'क्रेडिट' ले जाएंगे। यह ऑडियो राजनीति के उस घिनौने चेहरे को उजागर करता है जहाँ मासूम बच्ची के साथ हुआ अपराध भी पार्टियों के लिए सिर्फ एक 'चुनावी अवसर' है।

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4. 'आप' का सांप्रदायिक कार्ड: तुष्टिकरण की नई बिसात

आम आदमी पार्टी, जिसने 2021 के सूरत महानगर पालिका चुनाव में 27 सीटें जीतकर बदलाव की उम्मीद जगाई थी, आज अपने ही जाल में फंसी नज़र आ रही है।

  • विवादित वादे: 'आप' उम्मीदवारों द्वारा सभाओं में मुस्लिमों को "सड़कों पर नमाज़ और मज़ार बनाने की छूट" देने वाले वादे ने गुजरात की 'अस्मिता' वाली राजनीति को सक्रिय कर दिया है। गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी का कड़ा प्रहार—"गुजरात में तुष्टिकरण नहीं चलेगा"—भाजपा के लिए एक सुरक्षा कवच बन गया है।

  • भ्रष्टाचार के आरोप: 'आप' पर भी 3 लाख से 15 लाख रुपये में टिकट बेचने के आरोप उनके अपने ही कार्यकर्ताओं ने लगाए हैं, जिसने उनकी 'कट्टर ईमानदार' छवि को तार-तार कर दिया है।

5. भाजपा का 'कॉर्पोरेट' ढांचा: पन्ना प्रमुख बनाम साधारण कार्यकर्ता

भाजपा आज सिर्फ एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक 'NGO-ified' कॉर्पोरेट इलेक्शन मशीन है। उनका 'पन्ना प्रमुख' तंत्र दुनिया का सबसे बड़ा सूक्ष्म-प्रबंधन (Micro-management) मॉडल है।

  • मैनेजर वाली राजनीति: जहाँ विपक्ष अभी भी 'पुराने ढर्रे' पर नेताओं की रैली कर रहा है, वहीं भाजपा के पास हर 30 वोटर्स पर एक 'मैनेजर' तैनात है। उसे पता है कि किस घर में नाराजगी है और किसे वोटिंग के दिन घर से निकालकर बूथ तक लाना है। यही वह कारण है जिससे भाजपा अगले 10 साल तक अजेय नज़र आती है।

6. NOTA: गांधी जी की लकड़ी या जनता का भ्रम?

आक्रोशित जनता, जिसे सोसायटियों में नेताओं को घुसने से रोकते देखा जा रहा है, वह NOTA (None of the Above) को अपना आखिरी हथियार मान रही है। लेकिन क्या NOTA वाकई भाजपा के अहंकार को तोड़ पाएगा?

  • हकीकत: भारत में NOTA एक 'कागजी शेर' है। इसके पास 'Right to Reject' की शक्ति नहीं है। यह सिर्फ एक 'सांकेतिक गुस्सा' है। तकनीकी रूप से NOTA दबाकर मतदाता असल में उसी मज़बूत पार्टी की मदद कर देता है जिसका संगठन अनुशासित है, क्योंकि विरोधी वोट 'बेकार' हो जाता है।

7. जनता का 'दोगलापन' या सुरक्षा की मजबूरी?

एक कड़वा सच यह भी है कि जो लोग आज फेसबुक और व्हाट्सऐप पर भाजपा को गालियाँ दे रहे हैं, कल सुबह उन्हीं में से अधिकांश लोग चुपचाप जाकर 'कमल' का बटन दबाएंगे।

  • डर का फैक्टर: यह डर भाजपा का नहीं, बल्कि 'अराजकता' का है। मध्यम वर्ग को लगता है कि अगर भाजपा गई, तो सिस्टम ठप हो जाएगा या फिर पुराने दौर की सांप्रदायिक हिंसा वापस आ जाएगी। जनता 'ज्ञात बुराई' (Known Evil) को 'अज्ञात सुधार' (Unknown Improvement) से बेहतर मानती है।

निष्कर्ष: क्या 26 अप्रैल कोई नया इतिहास लिखेगा?

सूरत की सोसायटियों के बंद गेट, अल्थान की घटना पर उमड़ा जन-सैलाब और विपक्ष की 'टिकट मंडी'—ये सब एक ऐसे मोड़ की ओर इशारा कर रहे हैं जहाँ चुनाव का परिणाम बहुत पहले ही 'मैनेज' हो चुका है। क्या 26 अप्रैल को मतदाता अपनी 'मजबूरी' की बेड़ियाँ तोड़ पाएगा? या फिर भाजपा का यह मदमस्त हाथी अपनी विजय यात्रा को और भी आक्रामक बना देगा?

सीधी बात यह है कि जब तक गुजरात में एक 'विश्वसनीय और ईमानदार विकल्प' खड़ा नहीं होता, तब तक लोकतंत्र का यह उत्सव 'औपचारिकता' बनकर रह जाएगा। सवाल यह नहीं है कि कल कौन जीतेगा, सवाल यह है कि— क्या हम वाकई एक जीवंत लोकतंत्र हैं या हम एक ऐसी 'वन-वे' सड़क पर चल पड़े हैं जहाँ मुड़ने का कोई रास्ता ही नहीं बचा?

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