रूस का Su-57 ऑफर, स्वदेशी AMCA और 2035 तक का सामरिक रोडमैप


 

रूस का Su-57 ऑफर, स्वदेशी AMCA और 2035 तक का सामरिक रोडमैप

प्रस्तावना: 5वीं पीढ़ी के युद्धक विमानों की अनिवार्यता

आधुनिक युद्धनीति अब 'संख्या' (Quantity) से हटकर 'गुणवत्ता' (Quality) और 'अदृश्यता' (Invisibility) पर टिक गई है। आज से एक दशक पहले तक रडार पर विमान का दिखना सामान्य था, लेकिन आज 'लो ऑब्जर्वेबल' (Low Observable) तकनीक यानी स्टेल्थ ही जीत की गारंटी है। भारत इस वक्त एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ हमारा महत्वाकांक्षी स्वदेशी प्रोजेक्ट AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) है, और दूसरी तरफ रूस का 'मदर ऑफ ऑल ऑफर्स' Su-57E। सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली B-2 स्पिरिट या काल्पनिक बमवर्षकों की तस्वीरों से अलग, असली लड़ाई उन सूक्ष्म तकनीकों की है जो विमान को रडार की नज़रों से ओझल रखती हैं।

1. स्टेल्थ का विज्ञान: रडार क्रॉस सेक्शन (RCS) का खेल

एक आम फाइटर जेट, जैसे सुखोई-30 MKI, रडार पर एक बड़े फुटबॉल के मैदान जितना बड़ा दिखता है। वहीं, एक 5th Generation विमान रडार पर एक छोटी चिड़िया या कंचे (Marble) के बराबर दिखता है। इसे RCS (Radar Cross Section) कहते हैं।

  • डिजाइन की बारीकी: स्टेल्थ के लिए विमान की बॉडी पर कहीं भी 90-डिग्री का कोण नहीं होना चाहिए। AMCA और Su-57 दोनों में 'सर्पेन्टाइन एयर इनटेक' का इस्तेमाल होता है, जो इंजन के घूमते हुए ब्लेड्स को छुपा देता है, क्योंकि ये ब्लेड्स रडार तरंगों को सबसे ज़्यादा रिफ्लेक्ट करते हैं।

  • इंटरनल वेपन्स बे (IWB): जब मिसाइलें पंखों के नीचे लटकी होती हैं, तो वे रडार के लिए एक 'सिग्नेचर' बन जाती हैं। असली स्टेल्थ वह है जहाँ मिसाइलें विमान के 'पेट' के अंदर बने गुप्त दरवाजों में बंद हों और सिर्फ फायरिंग के वक्त ही बाहर आएं।

2. रूसी Su-57E: एक विवादास्पद लेकिन घातक शिकारी

रूस का Su-57 'फेलन' (Felon) दुनिया के सबसे शक्तिशाली इंजनों में से एक 'Saturn AL-51' (पहले Izdeliye 30) से लैस होने जा रहा है।

  • सुपरक्रूज क्षमता: यह विमान बिना 'आफ्टरबर्नर' जलाए सुपरसोनिक स्पीड पर उड़ सकता है। इससे दो फायदे होते हैं—पहला, ईंधन की बचत और दूसरा, 'इंफ्रा-रेड सिग्नेचर' का कम होना, जिससे दुश्मन की हीट-सीकिंग मिसाइलें इसे पकड़ नहीं पातीं।

  • S-70 ओखोत्निक और MUM-T: रूस जो ऑफर दे रहा है, उसमें 'Manned-Unmanned Teaming' (MUM-T) सबसे अहम है। इसमें Su-57 का पायलट एक साथ चार S-70 'हंटर' ड्रोन्स को कंट्रोल करता है। ये ड्रोन्स 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (AI) से लैस होते हैं और पायलट के लिए रास्ता साफ़ करते हैं। भारत के लिए यह तकनीक इसलिए जरूरी है क्योंकि हमारे पास अभी इस स्तर का UCAV (Unmanned Combat Aerial Vehicle) तैयार नहीं है।

3. स्वदेशी AMCA: भारत की 'आत्मनिर्भर' चुनौती और 2026 का स्टेटस

 AMCA सिर्फ एक प्लेन नहीं, भारत की 'एयरोस्पेस इंजीनियरिंग' की परीक्षा है। DRDO और ADA (Aeronautical Development Agency) इस पर दिन-रात काम कर रहे हैं।

  • मार्क-1 और मार्क-2 का अंतर: AMCA का पहला संस्करण (Mk-1) अमेरिकी GE-414 इंजन के साथ उड़ेगा, लेकिन असली ताकत Mk-2 में आएगी, जिसे भारत और फ्रांस (Safran) मिलकर बनाएंगे। यह इंजन 110-120 kN की ताकत पैदा करेगा।

  • टाइमलाइन का संकट: एक्सपर्ट्स जानते हैं कि विमान का डिजाइन बनाना एक बात है और उसे 'सर्टिफाई' करना दूसरी। अगर 2027 में पहला प्रोटोटाइप उड़ता भी है, तो कम से कम 1000-1500 टेस्ट फ्लाइट्स के बाद ही वह युद्ध के लिए तैयार माना जाएगा। यही वह 'विंडो' (Gap) है जिसे चीन अपने J-20 बेड़े के साथ भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है।

4. सप्लाई चेन और 'रिवर्स इंजीनियरिंग' की हकीकत

हमने चर्चा की थी कि क्या भारत खुद पार्ट्स बना सकता है? एक विमान में लगभग 30,000 से 40,000 पार्ट्स होते हैं।

  • स्वदेशीकरण की सीमा: भारत ने सुखोई-30 को 70% तक स्वदेशी बना लिया है। लेकिन Su-57 के मामले में हमें 'कंपोजिट मटेरियल्स' और 'रडार एब्जॉर्बेंट कोटिंग' (RAM) की केमिकल संरचना समझनी होगी।

  • भारत का लाभ: रूस की सप्लाई चेन टूटने का मतलब भारत के लिए अवसर है। अगर हम 'टेक्नोलॉजी ट्रांसफर' (ToT) के तहत 'सोर्स कोड' हासिल कर लेते हैं, तो हम न केवल पार्ट्स बनाएंगे बल्कि रूसी सॉफ्टवेयर में अपनी भारतीय मिसाइलों (जैसे अस्त्र और ब्रह्मोस-NG) को इंटीग्रेट करने के लिए आत्मनिर्भर हो जाएंगे।

5. क्यों R&D में करोड़ों खर्च होते हैं?

  • मैटेरियल साइंस: एक फाइटर जेट में इस्तेमाल होने वाला टाइटेनियम या कार्बन-फाइबर कंपोजिट जिस तापमान को झेलता है, उसे बनाने के लिए अरबों की लैब चाहिए होती है।

  • सॉफ्टवेयर का महत्व: आज का फाइटर जेट "कंप्यूटर विद विंग्स" है। इसका करोड़ों लाइन्स का कोड यह तय करता है कि इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के दौरान भी रडार कैसे काम करेगा।

6. निष्कर्ष: राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम स्वदेशी ज़िद

भारत के लिए सबसे अच्छी रणनीति 'हाइब्रिड एप्रोच' हो सकती है। हमें रूस से Su-57 की कुछ स्क्वाड्रन्स लेनी चाहिए, लेकिन इस शर्त पर कि वे हमें वह टेक्नोलॉजी दें जो हमारे AMCA प्रोजेक्ट को 5 साल आगे बढ़ा दे।

चीन का J-20 और पाकिस्तान का बदलता वायुसैनिक बेड़ा हमें रुकने का मौका नहीं देता। भारत को 'जुगाड़' से निकलकर 'वर्ल्ड क्लास मैन्युफैक्चरिंग' में उतरना ही होगा। चाहे वह आसमान में उड़ने वाला 'अदृश्य शिकारी' हो या सड़क पर चलने वाली 'TRUTH' SUV—बिना रिसर्च और भारी निवेश के हम वैश्विक महाशक्ति नहीं बन सकते।


लेखक: प्रतीक काशीकर (संपादक, टच गुजरात)

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