545 से 850: क्या हो पाएगा राजनीतिक भूगोल में परिवर्तन?
545 से 850: क्या हो पाएगा राजनीतिक भूगोल में परिवर्तन?
भारत की जनसंख्या आज 146 करोड़ के करीब पहुँच चुकी है, ऐसे में यह एक बड़ी विडंबना है कि हम आज भी 1973 की व्यवस्था के अनुसार ही लोकतंत्र जी रहे हैं। क्या अब वक़्त आ गया है राजनीतिक भूगोल बदलने का? क्या महिलाओं के लिए 33% आरक्षण होना चाहिए? ये सवाल 16 अप्रैल, 2026 को संसद भवन के विशेष सत्र में पेश किए गए '131वें संविधान संशोधन विधेयक' (नारी शक्ति वंदन अधिनियम - विस्तार) के तहत उठाए गए हैं। आइए जानते हैं कि इन सवालों के सही जवाब क्या हैं और यह बिल भारत की किस्मत कैसे बदल सकता है...
इतिहास के झरोखे से: कब-कब बदली संसद की सूरत?
इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमें थोड़ा इतिहास में भी गोता लगाना पड़ेगा। आज़ादी के बाद से अब तक सीटों को बढ़ाने की प्रक्रिया चार बार (1952, 1963, 1973 और 2002) हुई है। लोकसभा सीटों की संख्या में आखिरी बड़ा बदलाव 1973 में हुआ था, जब सीटों को 525 से बढ़ाकर 545 किया गया।
इसके बाद 1976 में आपातकाल के दौरान सीटों को साल 2000 तक के लिए 'फ्रीज' कर दिया गया था, जिसे बाद में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 2026 तक के लिए बढ़ा दिया। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहित करना था, ताकि आबादी कम करने वाले राज्यों की राजनीतिक शक्ति कम न हो। आज स्थिति यह है कि 1971 में एक सांसद जहाँ 10 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता था, आज वही सांसद 25-30 लाख लोगों का बोझ उठा रहा है।
850 सीटों का 'सुपर' गणित और महिला आरक्षण
वर्तमान प्रस्ताव के अनुसार, लोकसभा सीटों की संख्या 545 से बढ़ाकर 850 की जाएगी। यह आज़ाद भारत का सबसे बड़ा विस्तार होगा।
- उत्तर प्रदेश: वर्तमान 80 सीटों से बढ़कर लगभग 145-150 सीटें।
- बिहार: वर्तमान 40 सीटों से बढ़कर लगभग 75-80 सीटें।
- 33% महिला आरक्षण: अगर सीटें 850 होती हैं, तो करीब 280 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इस बिल के जरिए इसे 2029 के चुनाव से ही लागू करने का प्रस्ताव है।
सियासी घमासान: विरोध और दलीलें
इस बिल के पेश होते ही विपक्ष और दक्षिण भारतीय राज्यों ने मोर्चा खोल दिया है।
सरकार का पलटवार: 'जनसंख्या ही लोकतंत्र का आधार'
सरकार का तर्क है कि 1971 के बाद से बढ़ी आबादी को प्रतिनिधित्व न देना उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है।
पीएम नरेंद्र मोदी का विज़न
प्रधानमंत्री ने इसे राजनीति से ऊपर 'राष्ट्र निर्माण' का मुद्दा बताया है।
| राज्य | वर्तमान सीटें | प्रस्तावित सीटें (अनुमानित) | वृद्धि (सीटें) |
| उत्तर प्रदेश | 80 | 143 | +63 |
| बिहार | 40 | 79 | +39 |
| महाराष्ट्र | 48 | 76 | +28 |
| पश्चिम बंगाल | 42 | 60 | +18 |
| मध्य प्रदेश | 29 | 52 | +23 |
| गुजरात | 26 | 43 | +17 |
| राजस्थान | 25 | 50 | +25 |
| तमिलनाडु | 39 | 49 | +10 |
| कर्नाटक | 28 | 41 | +13 |
| केरल | 20 | 20 | 0 |
इस बिल का सबसे गहरा असर गांधीनगर की विधानसभा पर पड़ेगा। अभी तक हम सिर्फ लोकसभा की बात कर रहे थे, लेकिन 131वें संशोधन बिल का सीधा कनेक्शन विधानसभा सीटों से भी है:
- 182 से 300 तक का सफर: वर्तमान में गुजरात विधानसभा की 182 सीटें हैं। सूत्रों और जनसंख्या के गणित (Proportional Representation) के हिसाब से परिसीमन के बाद यह संख्या बढ़कर 280 से 300 के बीच पहुँच सकती है।
- सिर्फ सीमा नहीं, शक्ति भी बदलेगी: अभी तक का परिसीमन सिर्फ निर्वाचन क्षेत्रों की 'सीमाएं' (Boundaries) बदलता था, लेकिन इस बार सीटों की संख्या बढ़ेगी। यानी गुजरात के नक्शे पर करीब 100 से ज़्यादा नए निर्वाचन क्षेत्र उभरेंगे।
2027 का चुनाव और 'बीजेपी का किला': * फायदा किसे?: सीटें बढ़ने से बीजेपी जैसे कैडर-बेस्ड संगठन को फायदा मिल सकता है, क्योंकि उनके पास हर स्तर पर कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज है। नए क्षेत्रों में जल्दी पकड़ बनाना उनके लिए आसान होगा।
विपक्ष की चुनौती: कांग्रेस और आप (AAP) के लिए इतनी सारी नई सीटों पर मज़बूत उम्मीदवार उतारना एक बड़ी चुनौती होगी।
.png)
.png)
.png)
.png)
.png)
.png)
No comments